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ममता शर्मसार, किसी के इश्क में पड़ी मां ने अपने एक बेटे को दी मौत दूसरा लापता

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हिंदुओं की प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक दुर्गा सप्तशती के प्रार्थना श्लोक में कहा गया है कि “कुपुत्र जायते क्वचदपी कुमाता न भवति। “अर्थात पुत्र कुपुत्र हो सकता है, परंतु माता कुमाता नहीं हो सकती। परंतु, पटना के फतुहा में एक कलयुगी मां ने अपने 14 वर्षीय पुत्र को मौत के घाट उतार कर मां जैसे पवित्र शब्द को ही कलंकित कर दिया। उसका दूसरा सात वर्षीय पुत्र भी लापता है, जिसे पुलिस तलाश रही है। पुलिस को अंदेशा है कि मां ने अपने उस पुत्र को भी लापता कर दिया है। इस हृदय विदारक वारदात का मूल कारण मां के इश्क में बेटे का बाधक बनना और अपने दूसरे बाप के साथ नहीं रहना है। फतुहा के कोल्हर गांव में रविदास टोला की 35 वर्षीया बिंदु देवी अपने 14 वर्षीय पुत्र दिलखुश की हत्या कर उसे फांसी का रूप देने के आरोप में फतुहा पुलिस के रडार पर है। कोल्हर के ग्रामीणों एवं इस पंचायत की मुखिया का कहना है कि बिंदु का चरित्र ठीक नहीं था। उसका पति रामजी रविदास जब इसका विरोध करता था तो बिंदु ने उसकी भी हत्या करवा दी थी। बिंदु कुछ दिनों तक अपने पहले पति के साथ पटना में रहती थी। इसी दौरन रामजी रविदास जब ट्रेन से पटना से फतुहा अपने घर जा रहा था तो संदिग्ध अवस्था में उसका शव रेलवे लाइन पर पाया गया था। यह जानकारी कोल्हपुर के रविंद्र यादव सहित दर्जनों ग्रामीणों ने इस संवाददाता को दी। ‘सन्मार्ग’ ने जब घटनास्थल पर जाकर इस वारदात की बारिकी से जांच की तो यह मामला सामने आया कि रामजी की मौत के बाद बिंदु ने अपने ही गांव के यादव टोला निवासी जगदीश यादव के 22 वर्षीय पुत्र नवलेश यादव से विवाह कर लिया। बिंदु का 14 वर्षीय पुत्र दिलखुश इस विवाह से खुश नहीं था। वह नवलेश के साथ नहीं रहना चाहता था। दिलखुश अपनी मां के इस कुकृत्य का विरोध करता था। बिंदु और दिलखुश के बीच कई बार विवाद भी हुआ था। अपने बेटे के विरोध का स्वर जब बढ़ गया तो बिंदु ने कोल्हर गांव छोड़कर फतुहा शहर के गोविंदपुर में नवलेश के साथ रहने लगी। सात वर्षीय आयुष जो बिंदु का दूसरा पुत्र है वह भी अपनी मां के साथ ही रहता था। दिलखुश अकेले ही कोल्हर में रहता था। कभी-कभी गोविंदपुर भी अपनी मां से मिलने आता-जाता था। दिलखुश पढ़ाई के साथ-साथ कपड़ा की दुकान में काम कर अपनी आजीविका भी चलाता था। कोलहर के ग्रामीणों के अनुसार, 28 दिसंबर, 2020 को दिलखुश अपने घर में ही फांसी के फंदे से लटकता पाया गया था। उसके पैर में भी जख्म के निशान थे। ग्रामीण बताते हैं कि दिलखुश जिस घर में फांसी के फंदे से लटकता मिला, उस घर की चाबी दिलखुश की मां बिंदु के पास थी और उसी चाबी से बिंदु ने घर का दरवाजा खोला था। अब सवाल यह है कि दिलखुश ने यदि फांसी लगाकर आत्महत्या की तो उसके कमरे के दरवाजे पर ताला किसने लगाया। गांव के लोग भी इस सवाल का जवाब ढूंढने में लगे हैं? ‘सन्मार्ग’ के संवाददाता ने जब रविदास टोला में भ्रमण किया तो एक भी महिला या पुरुष ऐसे नहीं मिले जिसने यह कहा हो कि दिलखुश ने खुद फांसी लगायी हो। औरत-मर्द हर की जुबान पर यही थी कि बिंदु ने अपने बेटे की हत्या कर उसके शव को फंदे से लटका दिया और उसे आत्महत्या का रूप दे दिया। ग्रामीणों में आक्रोश था कि पुलिस बिंदु को पकड़कर थाने ले गई। उससे कई घंटे तक थाने में पूछताछ भी की गयी। बाद में बिंदु को छोड़ दिया गया। जब ‘सन्मार्ग’ ने फतुहा के थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर मनीष कुमार से सच्चाई जानना चाहा तो उन्होंने भी यह स्वीकार किया कि दिलखुश की हत्या की गई है। मनीष ने तो यहां तक कहा कि बिंदु अकेले यह हत्या नहीं कर सकती, बल्कि उसके साथ उसके दूसरे पति नवलेश का भी इस हत्याकांड में हाथ हो सकता है। थानाध्यक्ष का कहना था दिलखुश की एक लीगल गार्जियन बिंदु ही थी। इसीलिए उसके बयान पर एफआईआर दर्ज की गयी। एफआईआर में बिंदु ने अपने भैसुर संजीवन को दिलखुश की हत्या का जिम्मेदार ठहराया है। इंस्पेक्टर मनीष के अनुसार, नवलेश का मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था। उस मोबाइल पर रिंग करने पर एक बार कॉल गया और उसके बाद से मोबाइल स्विच आॅफ है। बिंदु को भी कई बार कहा गया कि वह नवलेश को लेकर थाना आए, परंतु वह तरह-तरह का बहाना बना रही है। अब तो नवलेश और बिंदु दोनों फरार हैं। इसके साथ ही बिंदु का दूसरा सात वर्षीय बेटा आयुष भी न जाने कहां है? कोल्हर के ग्रामीणों को आशंका है कि शायद आयुष दिलखुश हत्याकांड का चश्मदीद हो, इसीलिए उसे भी गायब कर दिया गया। थानाध्यक्ष ने कहा कि आयुष के लापता होने की सूचना मिली है। पूरे मामले की बारीकी से छानबीन की जा रही है। कोई साक्ष्य या गवाह के बिना नामजद आरोपी पर कोई कार्रवाई नहीं किए जाने के बाद भी उन्होंने स्वीकार की। बरहाल, रामायण में केकई के दो रूप थे। एक कौशल्या पुत्र राम को केकई अपने प्राण से भी ज्यादा मानती थी। दूसरा कि राजा दशरथ द्वारा दिए गए वचन को पूरा कराने के लिए केकई ने राम को 14 वर्ष का वनवास भेज दिया। रामायण के राम 14 वर्ष बाद बनवास से लौटकर आए, परंतु बिंदु ने अपने बेटे को जहां भेजा वहां से कोई आता नहीं। आती है सिर्फ उनकी सिर्फ याद। आज भी कोल्हर के लोग दिलखुश को याद कर यह कहते हैं कि काश बिंदु अपने बेटे को मौत के घाट में उठाकर उसे किसी अज्ञात स्थान पर भेज देती, ताकि कभी तो दिलखुश कर कोल्हर की गलियों में दिखाई पड़ता।

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